मंगलवार, 16 सितंबर 2014

******** मेरा - राज दुलारा *******

******** मेरा - राज दुलारा *******
नन्हा मुन्ना सा तू जब ,
जीवन में मेरे आया!
खिल उठा ,मन का अँगना,
फैला जीवन में उजियारा!
माँ बनाकर मुझको तूने,
जीवन खुशियों से भर डाला!
कभी में कहती सूरज तुझको,
कभी चंदा कहकर बुलाती!
कभी लगाती काला टीका,
तुझ पर जाती  में बलिहारी!
माँ बनने के अभिमान से में,
खुद ही खुद पर इठलाती!
आकर जीवन में मेरे तूने,
बदल दिया जीवन सारा!
फूल खुशियों के खिल उठे,
फैला जीवन में उजियारा!
पल​-पल बढ़ता देख तुझे,
में भी बच्ची बन जाती!
हँसता देख तुझे मैं हँसती,
संग तेरे ही मुस्कुराती!
तेरी मासूम शरारतें,
मेरे मन को बहुत लुभाती!
माँ कहकर के जब तूने ,
मुझको ,पहली बार पुकारा!
भूल ग​ई में,दुनियाँ सारी,
लगा ब्रह्माँड, तुझमें समाया!
 गूँज उठी कानो में मेरे ,
तेरी मधुर स्वर की शहनाई!
लगा दूर कहीं पर कान्हा ने,
अधरों पे मुरली सजाई!
सुध​-बुध बिसरा देखूँ तुझको,
खुद ही खुद में हो निहाल​!
थाम के उँगली मेरी तूने,
जब नन्हें कदम बढ़ाये!
तेरे कदमों की आहट सुन​,
खुशियों के दीप जल जायें !
शरारत करता देख तुझे,
में मन ही मन मुस्कुराती!
अपने नन्हें कान्हा की हर अदा,
मेरे मन को बहुत लुभाती!
"आशा" के मन की तू आशा,
जुडी तुझसे हर अभिलाषा!
बस यही दुआ है मेरी रब से,
कर्म -पथ से तुम कभी देखो ,
विचलित न होना!
चाहें कितनी हो राहें मुशकिल ,
हो इरादे गर पक्के तो ,
मिल ही जाती है मंज़िल​!
माँ बनना ईशवर का दिया अनुपम उपहार है!
माँ बच्चे का रिशता बहुत ही खास और हर रिशते ,
से ऊपर होता है! बच्चे को बढ़ता देख जो खुशी एक माँ,
महसूस करती है,लफ़्ज़ नहीं उसे बयाँ करने के लिये!
जो भाव मेरे मन में उत्तपन्न हुये जब बेटे को बढ़ता देखा!
कुछ को शब्दों में उतारने की एक कोशिश की है!
माँ कि कोई जाति,धर्म ,और मज़हब नहीं होता !
उसके लिये तो सब कुछ उसका बच्चा होता है,
वो अमीर हो या गरीब उसकी असली दौलत उसकी,
औलाद होती है! जिसे सँवारने मैं वो अपना जीवन ,
उस पर न्योछावर कर देती है! कि उसका बच्चा एक ,
नेक इंसान बन जाये!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१६-०९-२०१४http://shrotriyaradhablog.blogspot.in/


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