************ ये-जिंदगी *************
कितनी अजीब और अंजानी सी है,ये-जिंदगी,
जितनी सी पास उतनी सी दूर है,ये-जिंदगी!
हर एक पल एक नया रंग बिखेरती है,ये-जिंदगी,
भाग रहा है,बेखबर सा हर एक,इंसान यहाँ,
बाबरा मन बुनता है,अनगिनत ख्वाव यहाँ !
भरता है फिर देखो उसमें सपनों के,रंग हजार,
नहीं खबर,कल कौनसा रंग ,दिखायेगी,ये-जिंदगी!
पल में सपनों के महल ढ़हा जाती है,ये-जिंदगी,
सारी उम्मीदें,आशायें,सपने,इच्छायें बिखर जाती हैं,
रह जाते हैं खंड़हर,देखो ढ़ेर में मलबे के दबकर!
ढ़ूढते -ढ़ूढते थक जाता है,इंसान इसमें जिंदगी,
पर मलबे के ढ़ेर में रह जाती हैं,यादों की अस्थियाँ!
जल से अपने अश्रुओं के कर उनका विसर्जन ,
फिर एक नयी तलाश में चल पड़ती है,ये-जिंदगी !
कितनी अजीब और अंजानी सी है,ये-जिंदगी,
जितनी सी पास उतनी सी दूर है,ये-जिंदगी!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें