रविवार, 21 सितंबर 2014

चाहत

******* चाहत ********
क्यों इस तरह तुम ,
हमारा इम्तिहान लेते हो,
ये विरह​-वेदना ,
अब हमसे ,सही नहीं जाती!
तुम्हारे वियोग में हम​,
हँसना भूल गये हैं !
भूख,प्यास तो हमें नहीं सताती,
पर तुम्हारी याद ,
रह - रहकर आती रहती है!
जिससे हमारी साँसों की निरंतरता,
बनी हुई है !
प्यार क्या है ..
ये तो हमें नहीं पता,
पर तुम्हें याद न करें,
ये हमसे हो नहीं सकता!
चाहत क्या है,
ये भी हम नहीं जानते!
पर तुम्हें भुलादें,
ये भी हमसे हो नहीं सकता!
तुम्हारी यादों की डोर टूटे,
उससे पहले....
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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