बुधवार, 24 सितंबर 2014

** मुद्दत ****

******* मुद्दत *********
मुद्दत हुई हमें मिले तुमसे,
जिंदगी रह गयी,
 दर्द बनके!
मेरे दिल के रिसते ज़ख्मों पर​,
 तुम ही रहे हो,
मरहम बनके!
"आशा"केसे जियेगें हम ,
बिना मिले उनसे!
हमारे जिस्म में बहते हैं,
जो लहू बनके !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२४-०९-२०१४

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