बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

ये जिदंगी

*** ये  जिदंगी *******
कैसी है  ये  जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
कभी-कभी बड़ी घुटन सी होती है,
कैसी है जीवन की मृग-मरिचिका,
जिसके पीछे  भागते-भाग्ते सारा जीवन,
 बीता जाता  है !
पर फिर भी रिक्तता ही हाथ ,
लगती  है !
 ढोते-ढोते रिश्तों का भार कंधे,
झुक जाते  है !
पर फिर भी कही,  अनकही सी  कसक ,
रह जाती है !
ये कैसा ताना-बाना  है !
ये कैसा रिशतों का मेला  है !
कितनी भीड़ है   फिर भी ,
 हर  इंसान, नितांत अकेला  है !
चेहरे पे हँसी का नकाब  है ,
मन में  कितना कसैला है !
कैसी है  ये  जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
ओहदों से तोले जाते है ,
  रिशतों  के मोल यहाँ !
जिसका जितना   ओहदा   है,
उतना  उसका मोल यहाँ !
क्यों ढ़ोते है ऐसे रिशतों को ,
जिनका  खुद का, कोई मोल नहीं !
ये सब देखकर के "आशा" के मन में ,
छा   जाती निराशा है !
कैसी है  ये  जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"***** 

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