*** ये जिदंगी *******
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
कभी-कभी बड़ी घुटन सी होती है,
कैसी है जीवन की मृग-मरिचिका,
जिसके पीछे भागते-भाग्ते सारा जीवन,
बीता जाता है !
पर फिर भी रिक्तता ही हाथ ,
लगती है !
ढोते-ढोते रिश्तों का भार कंधे,
झुक जाते है !
पर फिर भी कही, अनकही सी कसक ,
रह जाती है !
ये कैसा ताना-बाना है !
ये कैसा रिशतों का मेला है !
कितनी भीड़ है फिर भी ,
हर इंसान, नितांत अकेला है !
चेहरे पे हँसी का नकाब है ,
मन में कितना कसैला है !
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
ओहदों से तोले जाते है ,
रिशतों के मोल यहाँ !
जिसका जितना ओहदा है,
उतना उसका मोल यहाँ !
क्यों ढ़ोते है ऐसे रिशतों को ,
जिनका खुद का, कोई मोल नहीं !
ये सब देखकर के "आशा" के मन में ,
छा जाती निराशा है !
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"*****
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
कभी-कभी बड़ी घुटन सी होती है,
कैसी है जीवन की मृग-मरिचिका,
जिसके पीछे भागते-भाग्ते सारा जीवन,
बीता जाता है !
पर फिर भी रिक्तता ही हाथ ,
लगती है !
ढोते-ढोते रिश्तों का भार कंधे,
झुक जाते है !
पर फिर भी कही, अनकही सी कसक ,
रह जाती है !
ये कैसा ताना-बाना है !
ये कैसा रिशतों का मेला है !
कितनी भीड़ है फिर भी ,
हर इंसान, नितांत अकेला है !
चेहरे पे हँसी का नकाब है ,
मन में कितना कसैला है !
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
ओहदों से तोले जाते है ,
रिशतों के मोल यहाँ !
जिसका जितना ओहदा है,
उतना उसका मोल यहाँ !
क्यों ढ़ोते है ऐसे रिशतों को ,
जिनका खुद का, कोई मोल नहीं !
ये सब देखकर के "आशा" के मन में ,
छा जाती निराशा है !
कैसी है ये जिदंगी,
कैसा इसका खेला है !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"*****
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