चाँद तुम जरा ,
आहिस्ता - आहिस्ता चलो,
मेरे मेहबूब अभी- अभी सोये है !.
चाँद तुम अपनी चाँदनी पर ,
बादलों का परदा गिरालो .!
उसकी दूधिया रोशनी आ-आकर,
मेरे मेहबूब की आँखों मे चुभ रही .है!
तारों तुम कुछ देर के लिये ,
कहीं छिप जाओ ,
तुम्हारी टिम-टिमाहट से,
मेरे मेहबूब की नींद में
खलल पड रहा है !
.हवाओं तुम यूँ ,शोर न मचाओ,
जरा आहिस्ता-आहिस्ता बहो !
कहीं वो जाग न जायें,
.एक मुद्दत बाद वो घर आये .है!
...राधा श्रोत्रिय"आशा

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