गुरुवार, 13 नवंबर 2014

*** ये - जिंदगी *****

************ ये - जिंदगी ***********
एक तिलिस्म है,ये जिंदगी,
जितना इसे पाना चाहा,
उतना ही खो दिया !
अंधाधुंध सी दौड में हो शामिल,
तुम भी !
इसे पाने के लिये इसमें होना ,
जरूरी है !
बडा पेचीदा सा दिमाग है,
हर इंसान का !
कितनी ही खुशियाँ नाम शोहरत ,
मिल जाये यहाँ !
पर मन नहीं भरता उसका ,
अंदर से रिक्तता है ,जो शायद स्थायी है
सब पाकर भी वो खाली ही रहता है !
और गरीब की क्या खुशी क्या गम,
पैदा होने के साथ ही दब जाता है,
बोझ तले जिंदगी के !
जैसे उसका जन्म ही ,
अभिशाप बन गया हो उसके लिये!
आधे पेट भूख में,
गुजारता है बचपन,
माँ -पिता की गालियाँ खाते!
जवानी का कोई पता नहीं,
काम की तलाश में !
फिर घर परिवार का पालने की ,
जिम्मेदारी का निर्वहन करने में,
लगता है युवाकाल में ही जिंदगी की ,
साँझ घिर आई!
सारे स्वपन और उम्मीदों को मुखाग्नि दे,
अपने होने के सच को ,
झुठलाने की कोशिश में,
कामयाब हो ही जाता है !
फिर अफ़सोस नहीं करता
जो न पाया उसका!
और पाने की कोशिश में खुद को ,
खुशी-खुशी फ़ना करना ,
अपनी नियति मान लेता है !
जला लेता है, अपने मन की लौ,
उसके प्रकाश से निखर,
 खुद को तपाता है सोने सा !
तोडता है पत्थर निकालता है पानी,
गरीबी में जन्म लेना गुनाह नहीं,
गरीब मरना गुनाह है !
गरीब वो जिसने वक्त के हाथों,
शिकस्त कुबूल करली !
हिम्मत और होंसलों का हाथ ,
जिसने भी थामा,
उसके कदम मंज़िल चूमती है!
उठो आगे बढ़ो,
ये-जिंदगी देती नहीं लेती है !
तुम्हे कुछ लेना है इससे ,
तो टकराना होगा ,
खुद बनाना होगा रास्ता अपना!
एक बार मिली है जिंदगी,
हर दिन मरना है ,
या इसे मात दे हर पल में,
हजार गुना जीना है !
तय तुम्हें ही करना है !
मौत से टकराने वाला ही ,
मौत पर विजय पाता है!
बाकि जिंदगी तो ,
जानवर भी जी जाता है!
उठो जागो, तुम अपना रास्ता,
खुद चुनो !
खुशियाँ किसी की बपौती नहीं,
सबका समान अधिकार है,इन पर !
है हौंसला ,तो बढ़ाओ कदम ,
अपने हिस्से का आस्माँ तुम ले लो,
जमींन तो तुम्हारे ही कदमों में है !
यहाँ जो हँसे हैं ,बदहाली पर तुम्हारी,
रश्क करेंगे, तुम्हारी खुशहाली से !
तुम्हारा होना ही, सबूत होगा,
तुम्हारी विजय का ---------
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१३-११-२०१४

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