बुधवार, 12 नवंबर 2014

**** गुस्ताखी ******

******* गुस्ताखी ******
कैसी है तुम्हारी चाहत,
हम समझ नहीं पाते!
कभी हमें हँसाती है,
कभी हमें रुलाती है !
अगर हमें पता होता,
तो हम दिल को ये,
गुस्ताखी न करने देते!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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