*********** अपने हिस्से का उजियारा ***********
अमर बूटी खाकर तो आया नहीं कोई,
जो आया है सो जायेगा !
हर एक का मातम तो
मनाता नहीं कोई-------
खिला फ़ूल देख, मन ललचाता है,
दूसरे दिन शाख पर ,
वो बिखरा नज़र आता है !
जिंदगी चलने का नाम है देखो,
स्थायी यहाँ कुछ भी नहीं !
किसी की याद में आँसू बहाओ,
पर कब तक !
सूख जाते हैं वो भी--------
न पनपने दो अँधियारे को,
मन मेें !
धीरे -धीरे छा जायेगा वो,
दिलो -दिमाग पर !
जहाँ जाओगे ,ढ़ूढ़ ही लेगा,
महफ़िल हो या शमशान !
इंसान सी फ़ितरत नहीं,
कि छोड दे साथ अधर में !
हर जगह पाँव पसार ही लेता है------
निभाता है साथ,उसका,
साया भी !
ऐ इंसान बाहर निकल,
मन के अंधकार से !
सुनाना छोड़ अपना दर्द,
दुनियाँ को !
कोई देगा न साथ तेरा,
कहकहे लगायेंगे सब !
पीठ पीछे तुझ पर -----
देगें तुझे तेरी नाकामयाबी का,
सार्टिफिकेट !
हटा मन से अँधेरे के बादल ,
सूर्य सुख का उदय होने को,
लालायित है !
प्रविष्ट होने को जगह तो दे,
भीतर मन के !
छीन लेना है तुझे उससे ,
अपने हिस्से का उजियारा !
भरले अंजुरी अपनी ,
रोशन हो उठेगा जीवन सारा!
भले पूरे जग को,
रोशन करता हो सूरज,
पर किसी अंधे व्यक्ति की,
आँखों को रोशनी नहीं दे पाता !
उसकी लाठी ही उसका प्रकाश है--------
तू भी चुन ले अपनी राह ,
पाले मंजिल अपनी !
छीन ले अपने हिस्से का उजियारा,
जीले जिंदगी अपनी !
जो आया है सो जायेगा !
हर एक का मातम तो
मनाता नहीं कोई-------
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
०८-११-२०१४
अमर बूटी खाकर तो आया नहीं कोई,
जो आया है सो जायेगा !
हर एक का मातम तो
मनाता नहीं कोई-------
खिला फ़ूल देख, मन ललचाता है,
दूसरे दिन शाख पर ,
वो बिखरा नज़र आता है !
जिंदगी चलने का नाम है देखो,
स्थायी यहाँ कुछ भी नहीं !
किसी की याद में आँसू बहाओ,
पर कब तक !
सूख जाते हैं वो भी--------
न पनपने दो अँधियारे को,
मन मेें !
धीरे -धीरे छा जायेगा वो,
दिलो -दिमाग पर !
जहाँ जाओगे ,ढ़ूढ़ ही लेगा,
महफ़िल हो या शमशान !
इंसान सी फ़ितरत नहीं,
कि छोड दे साथ अधर में !
हर जगह पाँव पसार ही लेता है------
निभाता है साथ,उसका,
साया भी !
ऐ इंसान बाहर निकल,
मन के अंधकार से !
सुनाना छोड़ अपना दर्द,
दुनियाँ को !
कोई देगा न साथ तेरा,
कहकहे लगायेंगे सब !
पीठ पीछे तुझ पर -----
देगें तुझे तेरी नाकामयाबी का,
सार्टिफिकेट !
हटा मन से अँधेरे के बादल ,
सूर्य सुख का उदय होने को,
लालायित है !
प्रविष्ट होने को जगह तो दे,
भीतर मन के !
छीन लेना है तुझे उससे ,
अपने हिस्से का उजियारा !
भरले अंजुरी अपनी ,
रोशन हो उठेगा जीवन सारा!
भले पूरे जग को,
रोशन करता हो सूरज,
पर किसी अंधे व्यक्ति की,
आँखों को रोशनी नहीं दे पाता !
उसकी लाठी ही उसका प्रकाश है--------
तू भी चुन ले अपनी राह ,
पाले मंजिल अपनी !
छीन ले अपने हिस्से का उजियारा,
जीले जिंदगी अपनी !
जो आया है सो जायेगा !
हर एक का मातम तो
मनाता नहीं कोई-------
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
०८-११-२०१४
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