मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

२१ वी सदी के स्त्री स्वर​


साथ ही अपनी मर्यादा, परंपरा,परिवारिक दायित्व और बच्चों की जिम्मेदारीयों को भी बखूबी निभाती है !इन्हें निभाने में वो अपना वजूद तक भूल जाती है !ये रिश्ते ही उसकी पहचान बन जाते हैं !समाज ने चाहे कितना ही विकास कर लिया हो,वो तरक्की की कितनी ही दलीलें दे ,पर मानसिक स्तर पर स्त्री को बराबरी का दर्जा देना पुरुष के अंह को ग्वारा नहीं करता !
में पूछती हूँ घर -परिवार ,बच्चे क्या सब ओरत का है,क्या ये रिशते आदमी की जिम्मेदारी नहीं है !जो ओरत की हर गल्ती पर ऊँगली उठाता है,क्या कभी अपने गिरेबाँन में झाँकने की हिम्मत रखता है कि जिस ओरत पर वह ऊँगली उठाता है ,वह अपना सर्वस्व अपने रिश्तों को सँवारने में लगा देती है!कुछ पाने की चाहत के बिना,बदले में अगर वो कुछ चाहती भी है, तो वो थोडा सा प्यार ओर आत्म सम्मान ,जिन रिश्तों को पालने के लिये उसने दिन रात एक किये रात की नींद ओर दिन के चैन तक का त्याग किया ! जिन बच्चों को ९ महीने अपनी कोख में रख अपने खून ओर ममत्व से सींचती है,पल​-पल जिसकी हर धडकन को महसूस कर प्रसव पीडा सह, जिस बच्चे को वो जन्म देती है! ओर जन्म के बाद वही बच्चा पिता का हो जाता है!जन्म देने वाली माँ का क्या ?
क्या यही स्त्री का अपराध है कि वो एक पुरूष को जन्म देती है !जिसे कलेजे से लगा एक माँ संतृप्त होती है!जिसे उठना ,बैठना,चलना,बोलना सिखलाती है!समाज में रहने लायक इंसान बनाती है!उसी स्त्री के अहं को पल​-पल चोट पहुँचाई जाती है! या पुरुष के भीतर का डर उसे ये सब करने के लिये मज़बूर कर देता है!कि वह परिवार का मुखिया है,उसे सम्मान देना स्त्री का फ़र्ज़ है!पीढियों से चली आ रही मान्यताओं का वो पालन करता है! ओर दूसरी ओर ओरत से घर के साथ बाहर के काम की भी उम्मीद रखता है! मान्यताओं को पालना है तो पूरी तरह पालन करो सिर्फ़ जहाँ निजी हित है वहाँ परम्परायें ओर संस्कार की दुहाई, ओर जहाँ खुद की आजादी बात आई तो एकदम मार्डन हो जाता है! अरे इन्साँन हो कुछ ओर नहीं तो इन्सानियत न भूलो ये तो सोचो की सम्मान ओर हक जबरदस्ती या दबाब डालकर नहीं पाया जाता! ये तो मन का भाव है,जो स्वतः किसी के प्रति उतपन्न होते हैं!एक मासूम बच्चा भी प्यार की भाषा समझता है,जो बोल नहीं पाता पर चेहरे के भाव तो वो भी समझता है!ओरत का मन ईशवर ने इतना कोमल बनाया है,कि प्यार के मीठे दो बोल पर तो वो निहाल हो जाती है,ओर स्वंय को न्योछावर कर देती है! पर पति के द्वारा बोले गये अपशब्द उसे मानसिक पीडा पहुँचाते हैं,न चाहते हुये भी वो अपना सारा गुस्सा बच्चों पर निकालती है!पति-पत्नी के बीच होने वाला तनाव बच्चों के मन को कितनी चोट पहुँचाता है ,उस वक्त वो इसका अंदाजा भी नहीं लगा पाते हैं!इस तरह के बच्चे अंदर ही अंदर कुंठित होने लगते हैं!कभी कभी तो इसके चलते उनका मानसिक विकास भी अवरुद्ध हो जाता है!यही माहोल बच्चों क स्वभाव आक्रामक बना देता है,आगे जाके जिसका खामियाजा घर परिवार को भुगतना पडता है!जहाँ से उन मासूमों को प्यार की फुहार मिलनी चाहिये,वहाँ से दुत्कार मिलती है,उनका बाल मन सहम जाता है!कभी कभी तो देखने में आता है कि बच्चे पिता से नफ़रत करने लगते हैं,अपनी माँ के साथ गलत व्यवहार वो नहीं सह पाते!ये रिश्ते गाडी के दो पहियों की तरह होते हैं!एक पहिया गडबडाया तो पूरी गाडी डगमगा जाती है!जिस तरह गाडी को समय -समय पर सर्विसिंग की जरूरत होती है,उसी तरह रिश्तों को भी प्यार की गरमाहट की जरूरत होती है!स्त्री ओर पुरुष दोनो एक ही गाडी के दो पहिये है,एक  में कुछ भी गडबड हुई दूसरा भी लडखडा जाता है!दोनो को ही एक दूसरे की भावनाओं का आदर ओर सम्मान करना चाहिये!प्यार ,विशवाश ,ओर सुमति से बँधी रिश्तों की डोर बहुत मजबूत होती है!वक़्त ओर हालात की आँधी उन्हें डिगा नहीं सकती!ओर पति पत्नी का रिश्ता तो विश्वाश की डोर से बँधा होता है,जो कि बहुत ही नाज़ुक होती है!

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