रविवार, 7 दिसंबर 2014

********* नियती आँसू की **********
क्या तुमने कभी आँसूओं को,
सिसकते हुये देखा है !
नहीं शायद यही कहोगे तुम​,
आसाँन है तुम्हारे लिये,
जो मन चाहा बोलना !
अपने ही नज़रिये से
 देखते हो
दुनियाँ को तुम !
जरूरी नहीं कि हर बार,
तुम्हारा फ़ेैसला
ही सही हो !
देखा है मेनें सिसकते हुये,
आँसूओं को !
घुटते हैं भीतर ही भीतर​,
अंर्तमन की पीडा से ,
आज़ाद होना चाहते हैं!
सह नहीं पाते
 आत्मा पर रखा बोझ
बिना गल्ती सहना भी
 गुनाह है !
देखती हूँ जब भी में,
सिसकते हुये इन्हें,
भूल जाती हूँ,अपनी
सारी पीड़ायें !
मूक,अवाक सी,
 निहारती हूँ,आकाश
मन ही मन करती हूँ,
उससे सवाल !
काश की आँसूओं की भी,
 जुँबा होती,
कर पाते बयाँ अपनी पीडा!
कितना असहनीय दर्द ,
बरदाशत करते हैं
पके फ़ोडे में पडा मवाद​,
 सल सलाता हो जैसे,
बाहर बह निकलना चाहता है!
 समझता है, सहने वाला ही,
 पीडा का स्तर !
पर इनकी पीडा ,
कोई नहीं समझता!
न चाहते हुये भी इन्हें,
खुद को रोकना होता है!
शायद यही नियती है,
आँसुओं की------------
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
०७-१२-२०१४

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