शनिवार, 24 जनवरी 2015

** स्त्री (३)*

******** स्त्री (३)********
रसोई से उठते,
घी के धुँये सी सुबह​,
दीपक की लौ सी,
जलती शामें!
भाव का दीप प्रज्जवलित कर,
खुद को ही खडा कर लेती हूँ,
भगवान के आगे!
दिन की वीरानी जब ,
साँय -साँय कर कानों को,
भेदती हैं!
तब सोचती हूँ,
जीवन का ये कौनसा पक्ष है,
खुद होकर भी ,
अपना वजूद न होना!
बंधनों में बँधी "स्त्री"
किसी कठपुतली से कम ,
नहीं आँक पाती, स्वयं को!
जिनकी खातिर होम दिया,
पूरा जीवन,
मिटा दिया खुद को!
प्रत्युत्तर में जब ,
सुनने मिलता है!
बहुत जुबान चलती है,
कुछ सुनना सीखो,
कितनी वहस करती हो!
रात के सन्नाटे भी "आशा"
शोर करते, प्रतीत होते है!
लगता है,कानों की,
 सहन शक्ती अब​,जबाब दे रही है!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२५-०१-२०१५

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