बुधवार, 28 जनवरी 2015

** आँखें ******

******** आँखें *******
तेरी आँखों को, पढा तो,
लिखने का ख्याल आया!
तुझसे मिलकर जिंदगी में,
 ओर निखार आया!
 बड़ी बुझी-बुझी सी थी,
शामों-सेहर जिंदगी की!
तुझसे मिलकर ही हमें,
खुद पर प्यार आया!
देखो दूर ही रहना तुम​,
न मेरे करीब आना!
दूर रहकर ही, प्यार में तेरे,
 ओर निखार आया!
मुझे कौन जानता था,
तुझसे मिलने से पहले,
तुझसे मिलकर ही हुस्न पर,
मेरे ओर निखार आया!
इश्क़ की कश्ती में देखो,
चढ़ तो गये हैं हम !
सुनते हैं "आशा" जो भी गया,
वो कभी पार न आया !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२६-०१-२०१५

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