दिखने में सीधी-साधी
गोल सी गेंद
पर इसकि असली कीमत
है जाननी
तो किसी बच्चे से पूछो
कितनी कीमती होती है
ये गेंद
मिल-जुलकर सब जुगत
भिडाते
अपनी-अपनी पाँकेटमनी
सेकुछ पेसे बचाते फिर
लाते गेंद
रविवार के दिन का
करते
मिलकर सब इंतजार
किसी की खिड़की का
शीशा तोडती
किसी की बाउँड्री-वाँल
से अंदर अंदर पहुँच
जाती गेंद
कोई खींचता कान
इनके
कोई इन पर झल्लाता
पर इन सब में वो अपना
बचपन भूल जाता
सारे मिल बैठते कुछ
प्लान बनाते
गेंद खोजने की मुहिम
चलाते
दो बैठते नीचे एक को
ऊपर चढ़ाते
और सारे हाथ उनकी
मदद को उठ जाते
कूदकर बाउड्री-वाँल
फिर गेंद बाहर आती
फिर अगले रविवार तक
उनको इंतजार कराती
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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