शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

---------यादों का घर--------


आज तन्हाई में
तुम्हारी यादों नें
मुझे घेर लिया
दूर भाग रही थी
जिन यादों से में
ड़रकर आईने से दूरी बनाली
देखती तो तुम्हारा ही अक्स
नजर आता मुझे
आखिर क्यूँ ???
जाते नहीं तुम
मेरी यादों से
अरसा हुआ हमें
बिछड़े हुऐ
पर पल भर भी
ओझल नहीं हुऐ
मेरी आँखों से तुम
क्यों ???
कहीं ऐसा तो नहीं
हमारी यादों ने
अपना घर बसा
लिया हो
जो हमें एक दूसरे से
अलग नहीं होने देती
इस तन का क्या है
ये तो नश्वर है
आत्मा तो अजर -अमर है
हम रहें न रहें पर हमारी यादें
हमेशा साथ रहेंगी
हमारे नव-जीवन
के इंतजार में
जब हमारी यादें
नहीं हम साथ रहेंगे
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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