शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

--------------खून के रिश्ते------------


ब्रांड बिकता है क्बालिटी नहीं
बिना ब्रांड क्बालिटी की गारंटी नहीं
वक्त बदला है सोच बदली
एक वक्त था थोक मार्किट 
जहाँ मिलता था क्बालिटी
का सामान​
अब स्टोर्स और माँल हैं
न वक्त की बरबादी 
न झंझट साफ -सफाई का
वक्त के साथ सोच भी विकसित हुई
ब्रांड का असर सोच पर हुआ
रिश्तों की परिभाषा बदली
वक्त के साथ 
प्यार का रंग नहीं 
लेवल स्टेटस का
बंग्ला,लग्जरी गाडी,शानो-शौकत​
ब्रांडेड​,कपडे ,मार्डन लुक 
अगर नहीं तो शायद
आपको न पहचान पायें
हर रिशते मैं जेसे दीमक लग गयी
रह गया बाहरी आडंबर और छलावा 
भागते रहे ताउम्र जिन्हें निभाने मैं
घर ,परिवार​,बच्चे सब भूल​
अपने हैं खून के रिश्ते हैं
पर आँखों मैं खून के आँसू न लायें
तो कैसे कहलायें खून के रिश्ते
सामान मैं दीमक लगती देखी
पर जब रिश्तों मैं लग जाये 
तो शायद लेबल स्टेटस का
ब्रांड बिकता है क्बालिटी नहीं
बिना ब्रांड क्बालिटी की गारंटी नहीं
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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