जिसने हमारी नीदों को चुराया है
हमारी पलकों पर अपना पहरा
लगाया है
जब भी कुछ कहना चाहा उनसे
आँखों मैं अश्कों का सैलाब
उमड़ आया है
सोते हैं अपने घर मैं सुकून से वो
औरों की नींदे उडानें का हुनर
जिन्हें आया है
"आशा" क्या समझेंगें वो बस्ती
मैं रहनें वालों का दर्द
खुद के महलों की शान की खातिर
जिसने गरीबों के घरों को
उजड़वाया है
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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