रविवार, 2 मार्च 2014

-------------दस्तूर​-----------


बड़ा अजीब सा दस्तूर है
ये जमाने का
औरत के जज्बात और
भावनाओं की
कोई कीमत नहीं
इस दुनियाँ मैं
कितना टूटकर चाहा था
मैंने उसे
न मालूम था
उसका प्यार भी
बदलते मौसम की तरह​
रंग बदल लेगा
खेलकर मेरे जज्बातों से
खिलौने की तरह​
वो मुझसे ही
किनारा कर लेगा
लगता है पुरूषों ने
इसे "पेटेंट​" करा लिया है
जब चाह जिसे चाह लें
पर अगर औरत
खुलकर साँस भी
लेना चाहे
तो उसकी खुद्दारी पर भी
बेबफाई और
बदचलनी का
इल्जाम लगा दियाजाये
बड़ा अजीब सा दस्तूर है
ये जमाने का
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२-०३-२०१४

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