सोमवार, 3 मार्च 2014

-----------खव्वाईशों के पंख​-------------


हाँ अब मैं अपने लिये जीना चाहती हूँ
खव्वाईशों के पंख लगाके
स्वतंत्र आकाश मैं 
विचरना चाहती हूँ
दूर इस दुनियाँ से
कहीं दूर 
जाना चाहती हूँ
हाँ मैं खुद मैं खुद को
पाना चाहती हूँ
जीती रही आज तक 
सबके लिये
थक गयी हूँ मैं
रिश्तेनाते ,अपनापन सब​
बोझ से लगता है मुझे
कभी-कभी तो ये सब 
ढ़ोंग से लगते हैं मुझे
अब जब सब यहीं पर 
रह जाना है
खाली हाथ आये
खाली हाथ ही जाना है
फिर क्यों न तोड दूँ
बंधन मोहमाया के
चली जाऊ खोज मैं
उस परम सत्य के
जहाँ कोई अपना न कोई
पराया है
सारा संसार उसी मैं
समाया है
जिससे मिलकर सुखद​
अनुभूति होती है
आत्मा परमात्मा के
करीब होती है
मेरी खोज मेरी मंजिल पाना चाहती हूँ
हाँ मैं अपनी आत्मा मैं
खो जाना चाहती हूँ
सुनते हैं वहीं मिला करते है
 करते है परमेश्वर 
बहुत से सवाल हैं
सबक बहुत से जिंदगी
ने दिये है 
एक बार इन सबका
जबाब पाना चाहती हूँ
ताकि मुक्त हो सकूँ
जीवन के इन बंधनों से
खुलकर खुली हवा मैं
अब साँस 
लेना चाहती हूँ
हाँ अब मैं अपने लिये जीना चाहती हूँ
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
३-०३-२०१४

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