मंगलवार, 4 मार्च 2014

************बोझिल पलकें************


हम बंद आँखों से ही,
देखा करते हैं तुम्हें !
हमें देख तुम यूँ ,
न मुस्कुराओ !
हमारी बिखरी,
ज़ुल्फों को ,
तुम न सुलझाओ !
लोग ताने हमें,
देते हैं !
दीवाना कर दिया है,
तुम्हें कहते हैं!
हम तो खोजा करते हैं,
खुद को ,तुम्हारी
आँखों मैं!
पर पलकें
बोझिल हों,
झुक जाया
करती हैं अकसर​!
हम बंद आँखों से ही,
देखा करते हैं तुम्हें!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
४-०३-२०१४

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