क्यों तख्तो- ताज के लिये ,
लडते हैं दुनीया वाले,
ये तो सब उस खुदा की
ईनायते हैं!
वही सब पर अपनी,
निगाहें- करम करता हैं,
कभी कहीं दूर एकांत मैं !
प्रकृति के सान्निध्य मैं,
थोड़ा वक्त गुजारिये,
लगता हे हमसे बहुत
कुछ कहना चाहती हैं!
फुदकती नन्ही चिडिया,
अपने साथी को पुकारती हैं
तितलीयाँ ,फ़ूलों पर
इठलाकर खुद को किसी
परीलोक की शहजादी
समझती हैं!
गुन- गुन करता भँवरा,
निस्वार्थ भाव से सबको,
अपनी मधुर गुँजन सुनाता हैं!
ये पंक्षी हमें अनेकता मैं
एकता का संदेश देते हैं,
एक पानी के स्त्रोत से न
जाने कितने पंक्षी अपनी
प्यास बुझा लेते हैं!
एक दरख्त पर हजारों
पंक्षी अपनी गुजर कर
लेते हैं!
शाम को जब वापस
लौटते हैं तो एक शौर
सा सुनाई पडता हैं,
मानों अपने दिन भर का
हाल बयाँ कर रहे .हैं!
और ढ़लती साँझ के साथ
एक गहरी खामोशी...
अपनी- अपनी दुनीयाँ मैं
गुम हो जाते हैं!
फिर एक नयी सुबह की
उडान की तैयारी......
किसी से कोई गिला ,
शिकवा नहीं!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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