शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

------------बीते हुऐ लम्हें------------

बीते हुऐ लम्हें हमे बहुत याद आते हैं ख्बाबों ख्यालों मैं जब वो चले आते हैं हाथों में डाले हाथ देर रात तक छत पर टहलना दूर तक टिमटिमाते हुऐ जुगनुओं को देखना छत के सन्नाटे को चीरती हुई वो गज़ल की खनक​ हवाओं मैं बिखरी हुई रातरानी के फ़ूलों की महक​ बीते हुऐ लम्हें हमे बहुत याद आते हैं ख्बाबों ख्यालों मैं जब वो चले आते हैं हमें यूँ देख चाँद का शरमाकर छुप जाना और चाँदनी का हमारी छत पर​ उतर आना उनके बालों पे ओस का कण​-कण बिखर जाना और छूने पर हमारे मोतीयों सा सरक जाना बीते हुऐ लम्हें हमे बहुत याद आते हैं ख्बाबों ख्यालों मैं जब वो चले आते हैं उनकी आँखों की वो मासूम सी शरारतें और उनसे हमारी प्यार भरी शिकायतें आज फ़िर वो हवायें मुझे छूकर गुजर जाती हैं और उनमें बसी हमारी चाहत की सदायें फ़िजाओं मैं बिखर जाती हैं बीते हुऐ लम्हें हमे बहुत याद आते हैं ख्बाबों ख्यालों मैं जब वो चले आते हैं ...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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