गुरुवार, 6 मार्च 2014

*****मिन्नतें*****



रात भर बुलाते रहे हम​,
पर नींद हमारी आँखों से,
नाराज सी रही!

की कोशिश बहुत,
मिन्नतें भी की,
पर आने को पल भर भी,
न तैयार हुई!

रात भर बुना किये,
ख्बाबों मैं उन्हें,
उनके ख्यालों मैं ही बसर,
हमारी हर रात हुई!

खो गये हैं उनके इश्क मैं,
इस कदर​,
न दिन पर हक रहा न
अपनी रात रही!

बहुत समझाया दिल को,
की मिन्नत भी बहुत​,
पर कहाँ अपने बस मैं
अब कोई भी बात रही!

"आशा"डूबे हैं उनके इश्क मैं,
इस कदर हम​,
कि उबरने की हर कोशिश​
नाकाम रही!

रात भर बुलाते रहे हम​,
पर नींद हमारी आँखों से,
नाराज सी रही!

...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
६-०३-२०१४

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