शुक्रवार, 7 मार्च 2014

***अधूरी चाहत***



क्यों फिर तुम मेरी सोयी
चाहतों को जगाने आये हो .!
क्या तुम मेरे अतृप्त यौवन,
की प्यास बुझाने आये
हो ???
तुम्हारे लिये औरत सिर्फ़,
तुम्हारी ईच्छाओं को पूरा
करने वाला साधन मात्र है !
तुम पुरूष कभी औरत की,
चाहत की कीमत नहीं
समझ सकते .!
अगर तुम्हारा दिल चाहा,
तो प्यार कर लिया नहीं तो
छोड दिया !
अब रहम करो मुझ पर,
बख्श दो मुझे !
मेरे ही हाल पर रहने दो,
अब जो प्रीत की चिंगारी,
वक्त की राख में दब गयी
है उसे हवा न दो !
अगर भडक उठी तो
राख कर देगी तुम्हें !
मेने अपनी सारी चाहतों,
को सपनो के पालने में,
सुला दिया है !
हर पल लोरी गा-गाकर,
उनको सुलाती हूँ !
अब उन्हें सपनों से,
जुदा करने की हिम्मत
मुझमें नहीं !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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