*** ये-जिदंगी ***
बड़ी उलझी है ये जिंदगी,
पाकर खोना,खोकर पाना!
जैसे सिर्फ़ खोना ही खोना,
या सिर्फ़ पाना ही पाना!
रात ही रात हो जैसा,
या फ़िर सूरज ढ़ले ही न!
एक दूसरे का पूरक ही,
निरंतरता बनाये हुये है!
थक हार कर बैठ जाना,
तो जैसे मुर्दे को मारना है!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१६-०३-२०१४
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें