शनिवार, 5 अप्रैल 2014

मन की आहट

*** मन की आहट ***
सुनो न..
कब आओगे..
बोलो न...
कुछ बोलते क्यों नहीं तुम!
पहले दूर से भी तुम सुन लेते थे..
हमारे मन की आहट..
धड़कता था हमारा दिल..
तुम्हारे सीने मैं..
क्या हुआ अब तुम्हें ?
लगता हैं तुम्हारे इंतजार मैं,
 हमारी धड़कने मंद पड़ गयी हैं !
या तुमने ,
सुनना छोड़ दिया इन्हें !
कैसी नाराजगी है ये..
मनाना चाहते हैं हम​...
पर वक्त हमारे साथ..
चलता नहीं...
बहुत से रस्मों रिवाज है..
जिन्होने जकड़ रखा है हमें....
बताओ न तुम​..
क्या करें हम...
लगता ह अब हमारी....
धड़कनें भी..
 हमारी बात नहीं सुन पा रहीं....
सुनो न..
कब आओगे..
बोलो न...
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
५-०४-२०१४

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें