शनिवार, 14 जून 2014

ये जीवन

*******ये जीवन *******
कभी-कभी मुझे लगता है,
कि इंसान का जीवन भी 
मरुस्थल की भाँति है!!
जहाँ अनंत इच्छायें, सपने, 
मन में लिये, 
हर इंसान 
उन्हें पूरा करने की,
चाह में ताउम्र,
मृग-मरिचिका की भाँति ,
उनके पीछे दौड़ता रहता है...
नसीब सबका, 
अपना-अपना है,
कहाँ पहुँचाये पता नहीं!
पर प्रयास तो जरूरी हैं...
फिर मुझे लगता है कि,
हमारा शरीर भी,
एक मरुस्थल है!
जहाँ मन रुपी नदियाँ ,
अविरल गति से,
बहे जा रही हैं,
जिसमें इच्छा रूपी ,
असंख्य मछलियाँ तैर रही हैं!
जिनमें से कुछ,
बहुत कुछ जल्दी पाने की
चाह रहती है,
और अपनी इसी,
चाह के चलते तट से टकरा 
बाहर आ जाती हैं!!
और तड़प-तड़प कर,
दम तोड़ देती हैं!!
और फिर नयी असंख्य
इच्छा रूपी मछलियाँ,
जनम ले लेती हैं!!
ये क्रम अनवरत ,
चलता रहता है!!
शायद जीवन रूपी,
मरुस्थल मैं,
अपनी इच्छाओं सपनों को,
पूरा करने की चाह मैं..
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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