******* हैवानियत का खेल ***********
हैवानियत का खेल देखो कि आज,
जमाने का नया चलन बन गया!
कोई फ़र्क नहीं पड़ा उस शख्श को,
कोई अपनी जिंदगी से चला गया !
हमारे आँसू जो बहें तो महज़ पानी,
उनका पसीना भी लहू बन गया!
केसे चैन आता है उस दरिन्दे को,
किसी गरीब का तो घर लुट गया!
केसे सुकूँन से जी पाते है वो ज़ालिम,
किसी दामन को नापाक कर दिया
गलियों मैं चर्चा जब ये आम हुआ,
जीना पिता का ही क्यूँ दुश्वार हुआ !
क्या मुँह दिखायेंगे खुदा के घर वो,
लाश का भी जिन्होने धंधा कर लिया!
"आशा" देखकर करतूत दरिन्दों की,
इंसानियत से आज यकींन उठ गया!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२२-०७-२०१४
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