सोमवार, 18 अगस्त 2014

आत्मा की पीडा

********* आत्मा की पीडा *************
जब मेरी आत्मा हुई रूबरू मुझसे,
कर बैठी एक  सवाल !
गुनाह क्या है मेरा,
जो किया है तुमने,
जीना मेरा दुश्वार​!
क्यों बात -बात पर दम भरती हो,
आत्मा अजर है अमर है !
कितना छलनी करती हो मुझे,
 भूल जाती हो तब मेरी पीडा को,
देती हो दुहाईयाँ हजारों बार !
अजर -अमर होने से बेहतर ,
मैं तुमसा शरीर हो जाऊँ!
और मुक्त हो जाऊँ ,
अजर -अमर के,
इस बंधन से !
थक जाती हूँ मैं भी,
इतने शरीरों से गुजर​!
पर नहीं समझता कोई मेरा दर्द​,
काश कि तुम सुन समझ सको मुझे!
हतप्रभ ! अवाक सी में !
सुन रही थी वो आवाज​,
जो बयाँ कर रही थी अपनी पीडा,
शब्द न थे मेरे पास !
बोलने लगी वो ....
हर एक तन का कष्ट ,
चोटिल कर देता हैै मुझे!
छोड उसे फिर नये शरीर मैं,
प्रविष्ट होना !
सोचा मैंने भी,
चोट तन को हो या मन को,
घायल तो आत्मा ही,
होती है हर बार​!
निशब्द हो ग​ई में,
न दे पाई कोई जबाब​!
आप हम सब प्राणी कभी न कभी...
इस दौर से गुजरते है..
हो सकता है कोई जबाब हो...
आप सबके पास​..मुझे भी मिल जाये..
मेरे सवालों के जबाब​..
और दे पाऊँ मैं भी ...
आत्मा के सवालों के जबाब​..
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१९-०८-२०१४

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