******* शब्दों की मरहम ******
अपनो से मिले जख्मों की छिलन,
कहाँ सह पाती है ,
उनके शब्दों की मरहम !
देखकर मेरी तकलीफ़ ,
टूटकर बिखर जाता है दर्द भी!
ज़र्द पड जाता है ,
चाँद का भी चेहरा!
छुपा लेता है खुद को,
भीतर बादलों के!
शायद मेरे दर्द को महसूस,
करता है !
बन बूँदे साथ निभाता है,
बरसात की रातों मैं अकसर,
चाँद कहाँ नज़र आता है!
थमती सी लगती है मुझे,
नब्ज़ जिंदगी की!
छोड्ने को शरीर,रूह बैचेन सी ,
नज़र आती है मुझे!
लेकर साथ अपने ,
गुज़रे पलों के साये
निकल पडती है!
देखती है अपनो को,
हिकारत से भर उठती है!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
अपनो से मिले जख्मों की छिलन,
कहाँ सह पाती है ,
उनके शब्दों की मरहम !
देखकर मेरी तकलीफ़ ,
टूटकर बिखर जाता है दर्द भी!
ज़र्द पड जाता है ,
चाँद का भी चेहरा!
छुपा लेता है खुद को,
भीतर बादलों के!
शायद मेरे दर्द को महसूस,
करता है !
बन बूँदे साथ निभाता है,
बरसात की रातों मैं अकसर,
चाँद कहाँ नज़र आता है!
थमती सी लगती है मुझे,
नब्ज़ जिंदगी की!
छोड्ने को शरीर,रूह बैचेन सी ,
नज़र आती है मुझे!
लेकर साथ अपने ,
गुज़रे पलों के साये
निकल पडती है!
देखती है अपनो को,
हिकारत से भर उठती है!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
०९-०८-२०१४
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