*********** सर्दियों की सुनहरी धूप **************
अकसर मन के,आकाश से उतर ,
ज़ेहन मैं, बिखर जाती हैं
सर्दियों की सुनहरी धूप सी
यादें तुम्हारी!
छूकर मेरे मन को
एहसास दिलाती है तुम्हारे
हाथों की नर्म तपिश का!
सिहरन सी दौड जाती है,
पूरे जिस्म मैं, सुध-बुध बिसरा,
ढ़ूँढती हूँ तुम्हे!
नज़र नहीं आते हो जब तुम ,
सिमटा पाती हूँ खुद को,
सर्दियों की सुनहरी धूप सी,
यादों मैं तुम्हारी!
धीरे-धीरे तपिश कम होती,
महसूस होती है !
रेशा- रेशा होले-होले,दूर होते ,
पहाडी पर जब ढ़लता सूरज देखती हूँ
मैं हैराँ हो जाती हूँ !
सूखी मन की नदिया ,
न जाने केसे अचानक,
लबालब भर छलक आती है!
जी लेना चाहती हूँ फिर,
तुम्हारे एहसासों की नर्म ओस में भीगा,
प्यार भरे जज्बातों का वो लम्हाँ!
भूला दुनियाँ को जब,समा गयी थी,
आगोश मैं तुम्हारे !
लगा आकाश से चाँद तारे उतर आये ,
धरा पर,उस पल!
अपनी पावन रोशनी के तेज से,
बचाना चाहते हों,
दुनियाँ की नज़रों से हमें!
वक्त मानों थम सा गया था,
नज़रें तुमसे हटती न थी!
डर था कि पलक झपके,
और तुम खो न जाओ!
पर ख्बाब ही था टूट गया,
रह गयी उदासी भरी घनी अँधेरी रात,
शायद अमावस थी!
दिल ने उम्मीद का दामन न छोडा,
लगा चीर अँधेरे को चाँद से निकल,
उतर आओगे मेरे मन के आँगन में तुम!
और में खो तुम्हारी चाँदनी में,
हमेशा के लिये समा जाऊँगीं तुममें,
तुम आओगे न !
जब दूर पहाडी पर गिरी बर्फ़ पर,
सूरज की किरणें पडेंगी ,
और उनसे टकरा सुनहरी धूप,
उतर आयेगी खोल मन की खिडकी,
उठायेगी गहरी नींद से मुझे,
और ले जायेगी पहाडी के उस पार!
कोई न होगा जहाँ,
तुम करते होगे मेरा इंतजार
पा लूँगी तुम्हें हमेशा के लिये!
अकसर मन के,आकाश से उतर ,
ज़ेहन मैं, बिखर जाती हैं
सर्दियों की सुनहरी धूप सी
यादें तुम्हारी!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२०-०८-२०१४
अकसर मन के,आकाश से उतर ,
ज़ेहन मैं, बिखर जाती हैं
सर्दियों की सुनहरी धूप सी
यादें तुम्हारी!
छूकर मेरे मन को
एहसास दिलाती है तुम्हारे
हाथों की नर्म तपिश का!
सिहरन सी दौड जाती है,
पूरे जिस्म मैं, सुध-बुध बिसरा,
ढ़ूँढती हूँ तुम्हे!
नज़र नहीं आते हो जब तुम ,
सिमटा पाती हूँ खुद को,
सर्दियों की सुनहरी धूप सी,
यादों मैं तुम्हारी!
धीरे-धीरे तपिश कम होती,
महसूस होती है !
रेशा- रेशा होले-होले,दूर होते ,
पहाडी पर जब ढ़लता सूरज देखती हूँ
मैं हैराँ हो जाती हूँ !
सूखी मन की नदिया ,
न जाने केसे अचानक,
लबालब भर छलक आती है!
जी लेना चाहती हूँ फिर,
तुम्हारे एहसासों की नर्म ओस में भीगा,
प्यार भरे जज्बातों का वो लम्हाँ!
भूला दुनियाँ को जब,समा गयी थी,
आगोश मैं तुम्हारे !
लगा आकाश से चाँद तारे उतर आये ,
धरा पर,उस पल!
अपनी पावन रोशनी के तेज से,
बचाना चाहते हों,
दुनियाँ की नज़रों से हमें!
वक्त मानों थम सा गया था,
नज़रें तुमसे हटती न थी!
डर था कि पलक झपके,
और तुम खो न जाओ!
पर ख्बाब ही था टूट गया,
रह गयी उदासी भरी घनी अँधेरी रात,
शायद अमावस थी!
दिल ने उम्मीद का दामन न छोडा,
लगा चीर अँधेरे को चाँद से निकल,
उतर आओगे मेरे मन के आँगन में तुम!
और में खो तुम्हारी चाँदनी में,
हमेशा के लिये समा जाऊँगीं तुममें,
तुम आओगे न !
जब दूर पहाडी पर गिरी बर्फ़ पर,
सूरज की किरणें पडेंगी ,
और उनसे टकरा सुनहरी धूप,
उतर आयेगी खोल मन की खिडकी,
उठायेगी गहरी नींद से मुझे,
और ले जायेगी पहाडी के उस पार!
कोई न होगा जहाँ,
तुम करते होगे मेरा इंतजार
पा लूँगी तुम्हें हमेशा के लिये!
अकसर मन के,आकाश से उतर ,
ज़ेहन मैं, बिखर जाती हैं
सर्दियों की सुनहरी धूप सी
यादें तुम्हारी!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२०-०८-२०१४
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