शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

******* मुक्ति (२) *******

******* मुक्ति (२) ******* मुक्ति असल मैं क्या है ? जीवन का अर्थ होना ! या जीवन से छुटकारा " मृत्यु " जो लिया यहाँ से उसे, छोडना-------- जहाँ मैं आने के लिये, शरीर का आवरण लेना! ओर अपने गंत्व्य पर , लौटते वक्त , उसे त्याग देना! है मुक्ति------- जो कुछ है , सिमटा है इन दोनो के बीच! क्यों भरता है इतनी नफ़रत​, फ़िर भी इंसान दिलों में ! न कोई अमर हुआ, न होगा ! सब कुछ पाकर भी, उसके होने का ओचित्य​, न होना ! शायद यही हो , मुक्ति का मतलब​! आसक्ति किसी के प्रति न रहे, असंभव सा लगता है ये ! इंसान है,तो माया-मोह , सताता तो है ! जानना चाहती हूँ ? परेशान करते हैं ये सवाल​, मुक्त हैं --------- तो बंधन की अभिलाषा क्यों, और बंधन मैं बंध गये, तो तलाशते मुक्ति का मार्ग​! आखिर क्यों ??? अपने कर्तव्यों से विमुख होना, ये किस तरह की मुक्ती है! सीधी भाषा मैं बोले तो , पल्ला झाडना अपने कर्तव्यों से! मुक्ती हैं --------- बहुत उलझन भरी है, ये जिंदगी ! जितना जानने की कोशिश की, उलझने और बढीं ! आखिर कुछ तो रास्ता होगा, जो इन सबसे बाहर का हो! शायद समझ पायें होने का अर्थ, पाने का,खोने का,या सब होकर​, खुश हो कोई--------- या बिना कुछ पाये भी कुछ हैं, जो बहुत खुश हैं ! सच्ची मन की खुशी है उनके पास​, वो ही बता सकते हैं ! मुक्ति असल मैं क्या है ? ...राधा श्रोत्रिय​"आशा" २२-०८-२०१४

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें