******* मुक्ति (२) *******
मुक्ति असल मैं क्या है ?
जीवन का अर्थ होना !
या जीवन से छुटकारा
" मृत्यु "
जो लिया यहाँ से उसे,
छोडना--------
जहाँ मैं आने के लिये,
शरीर का आवरण लेना!
ओर अपने गंत्व्य पर ,
लौटते वक्त ,
उसे त्याग देना!
है मुक्ति-------
जो कुछ है ,
सिमटा है इन दोनो के बीच!
क्यों भरता है इतनी नफ़रत,
फ़िर भी इंसान दिलों में !
न कोई अमर हुआ,
न होगा !
सब कुछ पाकर भी,
उसके होने का ओचित्य,
न होना !
शायद यही हो ,
मुक्ति का मतलब!
आसक्ति किसी के प्रति न रहे,
असंभव सा लगता है ये !
इंसान है,तो माया-मोह ,
सताता तो है !
जानना चाहती हूँ ?
परेशान करते हैं ये सवाल,
मुक्त हैं ---------
तो बंधन की अभिलाषा क्यों,
और बंधन मैं बंध गये,
तो तलाशते मुक्ति का मार्ग!
आखिर क्यों ???
अपने कर्तव्यों से विमुख होना,
ये किस तरह की मुक्ती है!
सीधी भाषा मैं बोले तो ,
पल्ला झाडना अपने कर्तव्यों से!
मुक्ती हैं ---------
बहुत उलझन भरी है,
ये जिंदगी !
जितना जानने की कोशिश की,
उलझने और बढीं !
आखिर कुछ तो रास्ता होगा,
जो इन सबसे बाहर का हो!
शायद समझ पायें होने का अर्थ,
पाने का,खोने का,या सब होकर,
खुश हो कोई---------
या बिना कुछ पाये भी कुछ हैं,
जो बहुत खुश हैं !
सच्ची मन की खुशी है उनके पास,
वो ही बता सकते हैं !
मुक्ति असल मैं क्या है ?
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२२-०८-२०१४
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