गुरुवार, 21 अगस्त 2014

******** आँखे (इज़हारे इश्क )********


******** आँखे (इज़हारे इश्क ) 2********

इश्क़ तो बेकाबू है,
इस पर कहाँ किसी का,
जोर चलता है !
हर ऊँच-नीच ,
हर मज़हब से परे!
एक अलग ही ,
दुनियाँ है ये !
यहाँ तो रूहानियत​,
बहती है !
"आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जैसे"
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२२-०८-२०१४

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