************ माँ (मेरे मन के भाव माँ को समर्पित )******************
सुबह से मन बहुत बैचेन है,बहुत कोशिश करती हूँ पर नहीं सुनता,आपको ही ढ़ूँढता है,
जब से आपने मुँह मोडा है,
जीवन का हर पल मेरा आपके लिये रोया है!
दुनियाँ की भीड मेें,जब भी
तन्हाँ हो जाती हूँ!
माँ हमेशा आपको अपने करीब ,
ही पाती हूँ !
माँ बहुत घबराती हूँ,इस वक्त में जब सबके साथ होकर भी में तन्हाँ हूँ!
कैसा अजीब सा खालीपन है,सब कुछ है बस आप नहीं!मुझे लगता है,
बहुत गरीब हूँ में!
कैसी बेबसी है मेरी कि मेरे आँसू भी,
न बुला पाते हैं तुझे,
माँ बिन तेरे रहना होगा, सोच से ,
रूह काँप जाती,थी मेरी!
आज इस सच के साथ
जी रही हूँ में!
माँ में तुम्हें याद तो नहीं कर पाती ,
पर पल भर को भूली भी नहीं हूँ में!
आज भी वो पल मेरी आँखों में वहीं कैद है,
कहने को १५ बरस गुजर गये,
जब आपने नम आँखों से हमें
विदा किया था!
रास्ते का खाना बनाकर दिया था,
फिर भी प्यार से भर पेट खिलाया!
न मालुम था कि आपके हाथ की रोटी,
अब नसीब न होगी!
में सारी उम्र की भूख उसी वक्त आपके,
हाथ से खा मिटा लेती!
वो आपका मुस्कुराकर हमें
विदा करना !
और हमारे जाते ही अकेले में,
फूट-फूट कर रोना !
समझ नहीं पा रही क्या करूँ,
मन बहुत अशांत है!
काश कि आप आ जाओ आज ,
मेरे सिराहने!
और अपनी प्यार भरी थपकी,
दे मुझे सुलादो !
भूल जाऊँ अपनी सारी पीड़ा ,
और सारे गम !
जो बिना गलती के ये जमाना,
मुझे देता है !
माँ आपकी दी सीख कभी नहीं भूली में,
क्याअपने उसुलों पर चलना गुनाह है?
माँ में इस दुनियाँ के रंग में नहीं रंग पाई,
माँ शायद बस यही एक गुनाह है मेरा !
पर जो वक्त के साथ बदल जाये,
आप कहती थी ,वो इंसान नहीं!
कभी- कभी में कागज पर लिखती हूँ,पर मेरा मन मुझे छोड मायके की गलियों में चला जाता है!
चिर-परिचित अपना घर में डोर बेल बजाती हूँ,जानती हूँ आप अपनी निशचल मुस्कुराहट बिखेरते आओगी,और बोलोगी आ गयी बेटा...और सब भूल में लिपट जाती हूँ तुमसे-------------क्रमश:
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
सुबह से मन बहुत बैचेन है,बहुत कोशिश करती हूँ पर नहीं सुनता,आपको ही ढ़ूँढता है,
जब से आपने मुँह मोडा है,
जीवन का हर पल मेरा आपके लिये रोया है!
दुनियाँ की भीड मेें,जब भी
तन्हाँ हो जाती हूँ!
माँ हमेशा आपको अपने करीब ,
ही पाती हूँ !
माँ बहुत घबराती हूँ,इस वक्त में जब सबके साथ होकर भी में तन्हाँ हूँ!
कैसा अजीब सा खालीपन है,सब कुछ है बस आप नहीं!मुझे लगता है,
बहुत गरीब हूँ में!
कैसी बेबसी है मेरी कि मेरे आँसू भी,
न बुला पाते हैं तुझे,
माँ बिन तेरे रहना होगा, सोच से ,
रूह काँप जाती,थी मेरी!
आज इस सच के साथ
जी रही हूँ में!
माँ में तुम्हें याद तो नहीं कर पाती ,
पर पल भर को भूली भी नहीं हूँ में!
आज भी वो पल मेरी आँखों में वहीं कैद है,
कहने को १५ बरस गुजर गये,
जब आपने नम आँखों से हमें
विदा किया था!
रास्ते का खाना बनाकर दिया था,
फिर भी प्यार से भर पेट खिलाया!
न मालुम था कि आपके हाथ की रोटी,
अब नसीब न होगी!
में सारी उम्र की भूख उसी वक्त आपके,
हाथ से खा मिटा लेती!
वो आपका मुस्कुराकर हमें
विदा करना !
और हमारे जाते ही अकेले में,
फूट-फूट कर रोना !
समझ नहीं पा रही क्या करूँ,
मन बहुत अशांत है!
काश कि आप आ जाओ आज ,
मेरे सिराहने!
और अपनी प्यार भरी थपकी,
दे मुझे सुलादो !
भूल जाऊँ अपनी सारी पीड़ा ,
और सारे गम !
जो बिना गलती के ये जमाना,
मुझे देता है !
माँ आपकी दी सीख कभी नहीं भूली में,
क्याअपने उसुलों पर चलना गुनाह है?
माँ में इस दुनियाँ के रंग में नहीं रंग पाई,
माँ शायद बस यही एक गुनाह है मेरा !
पर जो वक्त के साथ बदल जाये,
आप कहती थी ,वो इंसान नहीं!
कभी- कभी में कागज पर लिखती हूँ,पर मेरा मन मुझे छोड मायके की गलियों में चला जाता है!
चिर-परिचित अपना घर में डोर बेल बजाती हूँ,जानती हूँ आप अपनी निशचल मुस्कुराहट बिखेरते आओगी,और बोलोगी आ गयी बेटा...और सब भूल में लिपट जाती हूँ तुमसे-------------क्रमश:
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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