शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

******** दर्द​- ऐ -दिल **********

******** दर्द​- ऐ -दिल **********
मेरे दर्द​- ऐ -दिल की सदा,
किसी ने सुनी नही !
मेरे रिसते जख्मों पर मरहम​,
किसी ने रखा नहीं !
जलती रही तुम्हारी याद की ,
अगन में ताउम्र​!
तुमने अपने एहसास कि ओस  से ,
मुझे छुआ तक नहीं !
मिट  गये जिसकी खातिर हम ,
उसे हमारी खबर तक नहीं !
किस से करे हम शिकवा कि कोई,
दर्द​- ऐ -दिल की सदा,सुनता नही!
आँसू भी न रहे अब आँख में देखो,
धड़कन कि हमें कुछ खबर नहीं !
कैसा हमारा नसीब कि देखो ,
काँटों में भी चुभन नहीं !
इस कदर सताया है जमाने ने हमें,
कि खार में भी शहद की ,
 मिठास सी रही !
क्यों है जालिम इतनी ये दुनियाँ,
हमारे जज्बातों का भी मोल नहीं!
दफ़न कर दिया हर एहसास ,
जिसकी खातिर हमने!
हमारी वफ़ा पर उसे अब ,
एतबार तक नही !
टूट रहा भरोसा अब खुद से ही,
किस तरह जियेंगें,खुद खबर नहीं!
मेरे दर्द​- ऐ -दिल की सदा,
किसी ने सुनी नही !
मेरे रिसते जख्मों पर मरहम​,
किसी ने रखा नहीं !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
११-१०-२०१४

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