रविवार, 14 दिसंबर 2014

तुम्हारी याद *

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 याद में, तुम्हारी, हमारी,
हर रात, भीग जाती है !
तुम तो, नहीं आते,
तुम्हारी यादें, चली आती है !
तुम्हारे, आने की उम्मीद ,
मन में, जगा जाती हैं !
ले साथ गुजरे,पलों के साये,
हम सोने जाते हैं !
तुम्हारे, एहसासों को,
सिराहना बना ,सो जाते हैं !
यूँ लगता है,रात के आँगन में,
दबे पाँव आकर
 सुबह,होले-होले से,
 दस्तक दे रही है !
 प्यार भरा,मखमली,रेशमी,
 एहसास लेकर​, हवायें आई हैं!
तुम्हारी खुशबू में,सराबोर हम
चोंककर, उठ जाते हैं !
बाहर आकर देखते हैं,
हल्के-हल्के धुँधलका ,
छँट रहा है !
सामने तुम्हें देख"आशा"
हम सुध-बुध  भूल, जाते है!
दोडकर तुम्हारी बाँहों में ,
हम समा जाते है!
...राधा श्रोत्रिय्"आशा"
१५-१२-२०१४

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