****** भावों की सरिता **********
भावों की सरिता कि,
थाह, नहीं कोई ,
नहीं ,कोई छोर !
एक बार, डूबने के,बाद ,
अंतहीन ,दिशाहीन हो,
मन, विचरता, है!
बेशकीमती, अनमोल,
खज़ाने,रिश्तों के !
हीरे- मोतीयों से ,जगमगाते है !
नफ़रतों की, बाढ में, बह जो,
समय की, नदी में, समाहित ,
हो गये !
पर उनकी, कल-कल करती,
सुमधुर ध्वनि , प्रायः कानो मेेें ,
गुजंन ,करती !
मन की आँखों, पर चढा,
नफ़रत का, चशमा,
ओर कानों ने, जिसे सुनकर भी,
अनसूना किया!
पर आज मन, बहा ले गया,
भावों की सरिता में!
मन का, कोना-कोना, यहाँ,
रिश्तों कि, पावन ज्योति से,
झिल-मिला, रहा था !
क्यों बो लेते हैं,नफ़रत की दीवार, हम
इन पावन,रिशतों में !
रूह तो, सबकी ही, पाक है,
कुछ पलो की,नारजगी की, वजह से,
ये रिश्तों का, अनमोल ,
समृदध, खजाना,
नफ़रतों के गहरे, सागर मेें,
दवा, देते हैं!
ओर ऊपरी, रिशतों की ,
तलाश में,
जिंदगी, गुजारते हैं!
जहाँ हम, खोजते हैं,अपनत्व,प्रेम,
वहाँ हमें, झूठ,छलावा,
मिथ्या प्रेम,ही मिलता हैं!
इस छलावे में, बहकर हम,
भुला देते है,हमारे अपनो को!
"आशा" मोती पावन रिश्तों के,
है ये, बहुत ,अनमोल्,
बँधी हुयी है, इनसे देखो,
अंतर्मन, की डोर !
देखो झरते हैं भावों के,
कोमल झरने यहाँ !
भावों की सरिता कि,
थाह नहीं कोई ,
नहीं कोई छोर !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२३-१२-२०१४
भावों की सरिता कि,
थाह, नहीं कोई ,
नहीं ,कोई छोर !
एक बार, डूबने के,बाद ,
अंतहीन ,दिशाहीन हो,
मन, विचरता, है!
बेशकीमती, अनमोल,
खज़ाने,रिश्तों के !
हीरे- मोतीयों से ,जगमगाते है !
नफ़रतों की, बाढ में, बह जो,
समय की, नदी में, समाहित ,
हो गये !
पर उनकी, कल-कल करती,
सुमधुर ध्वनि , प्रायः कानो मेेें ,
गुजंन ,करती !
मन की आँखों, पर चढा,
नफ़रत का, चशमा,
ओर कानों ने, जिसे सुनकर भी,
अनसूना किया!
पर आज मन, बहा ले गया,
भावों की सरिता में!
मन का, कोना-कोना, यहाँ,
रिश्तों कि, पावन ज्योति से,
झिल-मिला, रहा था !
क्यों बो लेते हैं,नफ़रत की दीवार, हम
इन पावन,रिशतों में !
रूह तो, सबकी ही, पाक है,
कुछ पलो की,नारजगी की, वजह से,
ये रिश्तों का, अनमोल ,
समृदध, खजाना,
नफ़रतों के गहरे, सागर मेें,
दवा, देते हैं!
ओर ऊपरी, रिशतों की ,
तलाश में,
जिंदगी, गुजारते हैं!
जहाँ हम, खोजते हैं,अपनत्व,प्रेम,
वहाँ हमें, झूठ,छलावा,
मिथ्या प्रेम,ही मिलता हैं!
इस छलावे में, बहकर हम,
भुला देते है,हमारे अपनो को!
"आशा" मोती पावन रिश्तों के,
है ये, बहुत ,अनमोल्,
बँधी हुयी है, इनसे देखो,
अंतर्मन, की डोर !
देखो झरते हैं भावों के,
कोमल झरने यहाँ !
भावों की सरिता कि,
थाह नहीं कोई ,
नहीं कोई छोर !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२३-१२-२०१४
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