गुरुवार, 1 जनवरी 2015

एक रिक्तता सी

***** एक रिक्तता सी *********
न जाने क्यूँ छा जाती है,
एक रिक्तता सी अकसर !
कभी- कभी शून्य में ,
चला जाता है मन !
तन भी खुद का साथ ,
छोड़ देता है !
कितना सूनापन जैसे,
अंर्तमन में,
वेक्यूम सी स्थिती,
निर्मित हो जाती है !
कितनी उधेड़बुन है ,
इंसानी जीवन में,
हजार बार बलि चढ़ती है,
अंर्तमन की!
फिर भी उसी से उम्मीदें,
आखिर कितना सहे !
समझता नहीं इंसान,
जीता है सिर्फ खुद में,
वशीभूत हो स्वार्थ के!
भूल जाता है,कुछ नहीं उसका,
न ये तन जिसके रूप-रंग पर
अभीमान है उसे!
नहीं धन...छूट जाना है,
सब यहीं पर अंधा हो,
भागता रहता है उम्र भर !
और सब पाकर भी ,
रह जाता है तन्हाँ
न धन साथ देता न शरीर !
न जाने क्यूँ छा जाती है,
एक रिक्तता सी अकसर !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
०५-१०-२०१४

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